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Monday, March 23, 2026

पापाजी किसी काम को करने के लिए इतना सोचा नहीं करते. बस 1 2 3 बोलकर कर देना चाहिए. इससे जिंदगी ज्यादा इजी हो जाती है.

5.

बेटी- पापाजी आप ना अनिल कपूर की तरह अपनी दाढ़ी काली करवा लो.
पापा- क्यूं भई?
बेटी- वो मेट्रो में लोग आपकी सफेद दाढ़ी देखकर आपको सीनियर सिटीजन समझ बैठते हैं. और फिर अपनी सीट ऑफर करने लगते हैं! 

[सच में कई बार मेट्रो में मेरे साथ हो चुका है ]

~15.09.2025~

6.

( पापा शीशे में देखते हुए बेटी से.)
 
पापा- शीशे में शक्ल तो ठीक लग रही है. इतना कमजोर नजर नहीं लग रहा लेकिन फोटो खींचाते वक्त कमजोर लग रहा हूं. 
बेटी- वो आप मम्मी के साथ फोटो खींचवा रहे हो ना! 

~10.10. 2025~

7.

( किसी काम को करने के बारे में बार-बार सोच रहा था कि कैसे करूं. )

बेटी- पापाजी किसी काम को करने के लिए इतना सोचा नहीं करते. बस 1 2 3 बोलकर कर देना चाहिए. इससे जिंदगी ज्यादा इजी हो जाती है. 

~26.11.25~


8.

पापा- 'याद है कुछ तुम्हें' और 'याद आया कुछ तुम्हें' में से कौन सी लाइन ज्यादा अच्छी है? 
बेटी- पापाजी पहली बात मैं कोई राइटर नहीं हूं. दूसरी बात मेरा ऐसा कुछ अनुभव नहीं रहा है. इसलिए मैं कुछ बता नहीं सकती. 
पिता- हा हा 😍

~28.11.25~ 

9.

पिछले दिनों बेटी का कहना था कि जब पेट ठीक ना हो तो चिंगम खानी चाहिए. उसका अनुभव कहता है. इसी का फायदा उठाते हुए हमने एक दिन उनसे एक चिंगम मांग ली. 

पापा- एक चिंगम तो दो ज़रा.
बेटी- ले लो. 
पापा- एक नहीं दो दे दो. 
बेटी- क्या पापाजी, ये विदेशी ब्रांड की है, महंगी भी है!
पापा- कहां की है ? 
बेटी- अमेरिका की. 
पापा- ओके. 
बेटी- पापाजी आपने गौर किया है कि हमें जो चीजें पसंद आती हैं वो सब की सब महंगी होती हैं 
पापा-हां ये तो है. पर ये अच्छी बात नहीं है. 
बेटी-हां वो तो है. लेकिन दूसरे एंगल से सोचो तो अच्छी बात भी है. जब हमें महंगी चीजें पसंद आएंगी तो हम मेहनत करके ज्यादा पैसे कमाने की भी सोचने लगेंगे.

~28.12.25~


Saturday, September 27, 2025

'चुनमुन बेटी' को जन्मदिन मुबारक

बेटी का जन्मदिन आज है. बेटी कुछ दिन पहले कई सालों के बाद कह रही थी कि पापाजी इस बार मेरे जन्मदिन पर क्या गिफ्ट दोगे? मैंने कहा कि देखते हैं. वैसे जब आपकी पॉकेट भरी-सी हो तो आदमी ना जाने क्या-क्या सोचता है. ये गिफ्ट देंगे. जन्मदिन पर ये करेंगे, वो करेंगे. वरना तो कहता ही कि देखते हैं. दरअसल मुझे लगता है कि इस बार बेटी कुछ अच्छा-सा जन्मदिन मनाना चाहती थी. अपने नए कमरे को सजाना चाहती थी. मैं तो ऐसे मामलों में आगे ही रहता हूं 😍 खैर केक-वेक तो आएगा ही. जन्मदिन मनाएंगे ही. रही गिफ्ट की बात तो पहले मन था कि बेटी को टेबल लैंप की जररूत सी है. वही मंगवा लेता हो. गिफ्ट का गिफ्ट हो जाएगा. और उसकी जरूरत भी पूरी हो जाएगी. लेकिन फिर जब टेबल लैंप ऑनलाइन ढूंढा तो वैसा टेबल लैंप मिला ही नहीं. जैसा मैं देना चाहता था यानि जैसा मुझे लगता है कि उसको जरुरत है. फिर सोचा चलो 'अरुंधति रॉय जी' की नई किताब आई है. वही दे देते हैं. इस गिफ्ट में मेरा भी लालच था कि इस गिफ्ट के बहाने में हम भी इस किताब को पढ़ लेंगे! लेकिन फिर ये प्लान भी ड्राप कर दिया. क्योंकि लालच बुरी बला होती है 😎


फिर एक रात अचानक ही ख्याल आया कि बेटी और मेरी बातचीत के कुछ टुकड़े लिखे पड़े हैं. जोकि मैं फेसबुक पर गाहे-बगाहे डालता रहता था. क्यों ना उन्हीं को एक ब्लॉग बनाकर डाल दिया जाए. साथ में उन बातचीत से संबधित चित्र भी ढूंढकर लगा दिए जाए. बेटी के बचपन से लेकर अब तक की यात्रा का एक छोटा विवरण हो जाएगा. बेटी पहले क्या सोचती थी. बेटी अब क्या सोचती है. याद के तौर पर रह जाएगा. कभी फुरसत में हुआ करेंगे तो बैठकर पढ़ा-देखा करेंगे. हंसा करेंगे 😆उसकी उस वक्त की गई समझदारी भरी बातों पर गर्व करा करेंगे. वैसे लोग एल्बम रखते हैं. हम ब्लॉग रखेंगे! उसमें क्या है. हम नए जमाने के पिता जो ठहरे 😍 फिर जब हम दोनों की उन छोटी-छोटी बातों को पढ़ा तो उसमें पाया कि बेटी की बातचीत में तो मासूमियत है. मजाक है. हाजिर जवाबी है.और कई जगह समझदारी भी है. यानि कुल मिलाकर एक अच्छी जीवन यात्रा है उसकी. बस फिर क्या था गिफ्ट फाइनल. 'ब्लॉग' गिफ्ट दिया जाएगा! ओए बल्ले-बल्ले 😍

फिर क्या था. एक पुराने ब्लॉग का नाम बदला. उसमें चंद पोस्ट ही थीं, उन्हें डिलीट किया. और फिर 'बातें-चुनमुन-की' नाम का एक ब्लॉग 'ब्लागस्पाट' पर बना डाला. जिसमें 34-35 पोस्ट बन गईं. यानि एक छोटी-सी एल्बम, एक छोटी-सी किताब, एक छोटी-सी फिल्म, एक छोटा-सा ब्लॉग! फिर दिल को लगा यार इससे अच्छा गिफ्ट क्या ही हो सकता है. हो सकता है इस गिफ्ट को कोई ना समझ पाए. लोग कहे कि ये भी कोई गिफ्ट होता है. इससे अच्छा तो ये दे देना चाहिए था. वो देना चाहिए था. खैर फिर लगा मेरे दिल ने जो कहा वो मैंने कर दिया. मुझे खुशी मिली. बाकी बेटी को भी पसंद आएगा. ये पक्का है. बाकी क्या है. आदमी का मन जो करे वो उसे कर दे. बस. और फिर उसके करने से जो खुशी मिलती है, शायद वही असल खुशी होती है. शायद यही जीवन का सुख भी होता है. शायद जीवन ऐसा ही होता है कि सोचो कुछ और फिर करो कुछ. पॉकेट का क्या है. आज खाली-सी है. कल भर जाएगी. जब भर जाएगी. तब वैसा कर लेंगे. जैसा आज नहीं कर पाएंगे. बाकी एक बेटी का पिता. अपनी बेटी को जन्मदिन मुबारक कहता है. और रब्ब से दुआएं मांगता है कि बेटी खुश रहे, स्वस्थ रहे. और अपने ख़्वाबों को पूरा करती रहे. बस. एक बार फिर से जन्मदिन मुबारक.

पापाजी पता है जब आप किसी चीज या आदमी को पसंद करने लगते हैं तो वो चीज अपनी और इंसान अपने ही लगने लगते हैं...

5.

आखिरकार कल कनॉट प्लेस जाकर बेटी के मोबाइल की सिम बदलवा ही दी. आप सोच रहे होंगे कि एक सिम के लिए सीपी. दरअसल हम बाप-बेटी को घूमने का बहाना चाहिए बाकी बात कुछ यूं भी है कि पहले बेटी अपने पापा की नजरों से कनॉट प्लेस को देखा करती थी. लेकिन पिछले दो एक सालों से बेटी खुद ही अकेले आने-जाने लगी है. तो अपनी नज़रों से दुनिया खासकर दिल्ली को देखने लगी है. बल्कि यूं कहूं कि कल बेटी मुझे कनॉट प्लेस में घूमा रही थी. एक बात बताऊं तो आप चौंक जाएंगे. पिछले करीब तीस सालों से कनॉट प्लेस जा रहा हूं लेकिन आजतक कनॉट प्लेस के ब्लाक के बारे में नहीं पता था. यानि कौन ब्लाक किधर है ये मुझे नहीं पता था. ये कल बेटी की वजह से पता लगा. पहले सिम बदलवाने का काम किया. सिम मिल तो गई लेकिन उन्होंने कहा कि इसे एक्टिव होने में करीब ४ घंटे लगेंगे, अगर इस समय में सिम एक्टिव नहीं होती है तो आपको फिर से यही आना पड़ेगा. मैं बार-बार आ नहीं सकता तो 4 चार घंटे यही बिताने थे.

इसी कारण बेटी कहने लगी कि चलो पापाजी 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर' चलते हैं. हम उधर की ओर चल दिए. कई सालों के बाद जाना हुआ था 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर'. पहले की अपेक्षा अब थोड़ा खुला-खुला सा लग रहा था. घुसते ही बेटी चहक सी गई. फिर इसके बाद इसने ना जाने कितनी किताबों और लेखकों से परिचय कराया, जिनके बारे में मुझे पता नहीं था. सबके सब विदेशी लेखक थे. एक दो नाम जो याद रह गए. 'Fredrik Backman', 'Haruki Murakami', 'Khalid hoosseini', 'Kristin Hannah' आदि आदि.


बल्कि बेटी 'Before the Coffee Gets Cold-Toshikazu Kawaguch (आजकल इसी किताब को पढ़ रही है.) किताब को उठाकर मुझे दिखाते हुए बोली,' पापाजी देखो मेरी किताब भी यहां है.'


मैं बीच ही में बोल उठा,' ये किताब आप ऐसे दिखा रही है जैसे आप ही की हो.' वो कहां रुकने वाली थी झट से बोलीं,' ओ हो पापाजी! पता है जब आप किसी चीज या आदमी को पसंद करने लगते हैं तो वो चीज अपनी और इंसान अपने ही लगने लगते हैं.'

 

'हां ये बात तो है. जैसे शाहरुख खान मुझे अपना-सा लगता है. उनकी फिल्म हीट हो जाए तो अच्छा लगता है. बेशक वो फिल्म मैंने देखी हो या ना देखी हो.' फिर वो बीच-बीच में अपनी पसंद की किताबें दिखाती रही.


फिर एक जगह रुकी और बोली,' पापाजी ये देखो 'Rom-Com Books'.' 'Rom-Com Books' मतलब.' मैं बोला. ' सच आपको 'Rom-Com Books' का नहीं पता. 'Rom-Com Books' मतलब 'रोमांटिक कॉमेडी' वाली किताबें. 'वो बोली.


सच मुझे आज से पहले Rom-Com किताबों का नहीं पता था. और सच बताऊं तो मैंने आजतक विदेशी लेखकों की कम किताबें ही पढ़ी हैं. लेकिन हां हिंदी के लेखकों को तो खूब पढ़ा है. और उनका परिचय बेटी से भी कराया है. उनके किस्से बेटी को सुनाएं भी हैं. लेकिन तब जब उसे इतनी समझ नहीं थी, जितनी अब है. इसे यूं ही भी कह सकते हैं. मैंने पहले बेटी को हिंदी के लेखकों से मिलवाया था. और बेटी अब विदेशी लेखकों से परिचय करवा रही थी.


फिर बाद में हम दोनों पेट पूजा के लिए 'सरवाना भवन' की तरफ निकल गए.

~17.5.2025~


पापाजी वे टीचर हों या फिर प्रोफेसर उन्हें अपना स्माइली फेस रखना चाहिए

 1.

पापा- कहां तक पहुंचे?

बेटी- कश्मीरी गेट.

पापा- अभी तक यहीं पहुंचे?

बेटी- वो मम्मी ने आइसक्रीम ले ली थी ना.

पापा- इतनी सर्दी में कौन आइसक्रीम खाता है!

बेटी- वो मम्मी ने ले ली थी ना. मुझे भी भूख लगी थी. 


2.

सीपी में खादी भंडार से थापर की तरफ आते हुए एक छोटे से स्टाल पर खीरे, ककड़ी कटे हुए लगे थे. उन्हें देख बेटी बोलीं. 'पापाजी खीरे खा लो.'

मैं बोला,' अब तो जमाने हो गए ऐसे कटे खीरे, मूली खाए हुए. किसी जमाने में हम खूब खाते थे.' मतलब ये कि 2020 के पहले खूब खाते थे.

तपाक से बेटी बोलीं,' पापाजी, अब तो पुराने जमाने का फैशन भी लौटकर आ रहा है. आप भी पुराना ज़माना लौटा लाओ.'

~12.04.25~


3.

पापा- अंकल जी के सवाल का जवाब देते वक्त आप आज थोड़ा घबरा गए थे बच्चू. वरना तो सही से बात कर लेते हो. 

बेटी- पता है पापाजी. वो टीचर हों या फिर प्रोफेसर, उन्हें अपना स्माइली फेस रखना चाहिए. मैं उनके चेहरे को देख डर गया था. फिर मैं जवाब देते वक्त जो बात कहना चाह रहा था, वो नहीं कह पाया. प्रोफेसरों को इतनी सीरियस नहीं होना चाहिए. तब तो बिल्कुल नहीं, जब किसी से अकेले में बात कर रहो. ठीक है क्लास लेते वक्त सीरियस हो जाओ.


[ दिल्ली विश्वविधालय के एक प्रोफेसर से मुलाक़ात के बाद.]


4.

पापा- कुछ लिखा है. सुनोगी.

बेटी- क्या लिखा है?

पापा- ख़त (एक तुकबंदी की थी बस.)

बेटी- किसको?

पापा- लड़की को!!

बेटी- जिस उम्र में लोग ये सब करने से मना करते हैं. आप उस उम्र में ये सब लिख रहे हो.

पापा- हा हा. अरे आप पूरी बात तो सुनो. 


( वो पूरी बात सुने बिना चली गई.)

~07.07.25~