बेटी- पापाजी आप ना अनिल कपूर की तरह अपनी दाढ़ी काली करवा लो.
पापा- क्यूं भई?
बेटी- वो मेट्रो में लोग आपकी सफेद दाढ़ी देखकर आपको सीनियर सिटीजन समझ बैठते हैं. और फिर अपनी सीट ऑफर करने लगते हैं!
[सच में कई बार मेट्रो में मेरे साथ हो चुका है ]
पापाजी देखो मैने केला छील लिया, मैं बड़ी हो गई. सच बेटी जल्दी से जल्दी बड़ी होना चाहती है. बड़ी होकर अपने मम्मी-पापा की वो हर चीज ले लेना चाहती है, जो वे इस्तेमाल करते हैं. वहीं उसके मम्मी-पापा बेटी की वो हर चीज संजोकर रखना चाहते हैं, जो उसके बचपन से जुड़ी हुई है. पता नहीं जिदंगी का ये कैसा पहलू है!
बेटी का जन्मदिन आज है. बेटी कुछ दिन पहले कई सालों के बाद कह रही थी कि पापाजी इस बार मेरे जन्मदिन पर क्या गिफ्ट दोगे? मैंने कहा कि देखते हैं. वैसे जब आपकी पॉकेट भरी-सी हो तो आदमी ना जाने क्या-क्या सोचता है. ये गिफ्ट देंगे. जन्मदिन पर ये करेंगे, वो करेंगे. वरना तो कहता ही कि देखते हैं. दरअसल मुझे लगता है कि इस बार बेटी कुछ अच्छा-सा जन्मदिन मनाना चाहती थी. अपने नए कमरे को सजाना चाहती थी. मैं तो ऐसे मामलों में आगे ही रहता हूं 😍 खैर केक-वेक तो आएगा ही. जन्मदिन मनाएंगे ही. रही गिफ्ट की बात तो पहले मन था कि बेटी को टेबल लैंप की जररूत सी है. वही मंगवा लेता हो. गिफ्ट का गिफ्ट हो जाएगा. और उसकी जरूरत भी पूरी हो जाएगी. लेकिन फिर जब टेबल लैंप ऑनलाइन ढूंढा तो वैसा टेबल लैंप मिला ही नहीं. जैसा मैं देना चाहता था यानि जैसा मुझे लगता है कि उसको जरुरत है. फिर सोचा चलो 'अरुंधति रॉय जी' की नई किताब आई है. वही दे देते हैं. इस गिफ्ट में मेरा भी लालच था कि इस गिफ्ट के बहाने में हम भी इस किताब को पढ़ लेंगे! लेकिन फिर ये प्लान भी ड्राप कर दिया. क्योंकि लालच बुरी बला होती है 😎
फिर क्या था. एक पुराने ब्लॉग का नाम बदला. उसमें चंद पोस्ट ही थीं, उन्हें डिलीट किया. और फिर 'बातें-चुनमुन-की' नाम का एक ब्लॉग 'ब्लागस्पाट' पर बना डाला. जिसमें 34-35 पोस्ट बन गईं. यानि एक छोटी-सी एल्बम, एक छोटी-सी किताब, एक छोटी-सी फिल्म, एक छोटा-सा ब्लॉग! फिर दिल को लगा यार इससे अच्छा गिफ्ट क्या ही हो सकता है. हो सकता है इस गिफ्ट को कोई ना समझ पाए. लोग कहे कि ये भी कोई गिफ्ट होता है. इससे अच्छा तो ये दे देना चाहिए था. वो देना चाहिए था. खैर फिर लगा मेरे दिल ने जो कहा वो मैंने कर दिया. मुझे खुशी मिली. बाकी बेटी को भी पसंद आएगा. ये पक्का है. बाकी क्या है. आदमी का मन जो करे वो उसे कर दे. बस. और फिर उसके करने से जो खुशी मिलती है, शायद वही असल खुशी होती है. शायद यही जीवन का सुख भी होता है. शायद जीवन ऐसा ही होता है कि सोचो कुछ और फिर करो कुछ. पॉकेट का क्या है. आज खाली-सी है. कल भर जाएगी. जब भर जाएगी. तब वैसा कर लेंगे. जैसा आज नहीं कर पाएंगे. बाकी एक बेटी का पिता. अपनी बेटी को जन्मदिन मुबारक कहता है. और रब्ब से दुआएं मांगता है कि बेटी खुश रहे, स्वस्थ रहे. और अपने ख़्वाबों को पूरा करती रहे. बस. एक बार फिर से जन्मदिन मुबारक.
इसी कारण बेटी कहने लगी कि चलो पापाजी 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर' चलते हैं. हम उधर की ओर चल दिए. कई सालों के बाद जाना हुआ था 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर'. पहले की अपेक्षा अब थोड़ा खुला-खुला सा लग रहा था. घुसते ही बेटी चहक सी गई. फिर इसके बाद इसने ना जाने कितनी किताबों और लेखकों से परिचय कराया, जिनके बारे में मुझे पता नहीं था. सबके सब विदेशी लेखक थे. एक दो नाम जो याद रह गए. 'Fredrik Backman', 'Haruki Murakami', 'Khalid hoosseini', 'Kristin Hannah' आदि आदि.
बल्कि बेटी 'Before the Coffee Gets Cold-Toshikazu Kawaguch (आजकल इसी किताब को पढ़ रही है.) किताब को उठाकर मुझे दिखाते हुए बोली,' पापाजी देखो मेरी किताब भी यहां है.'
मैं बीच ही में बोल उठा,' ये किताब आप ऐसे दिखा रही है जैसे आप ही की हो.' वो कहां रुकने वाली थी झट से बोलीं,' ओ हो पापाजी! पता है जब आप किसी चीज या आदमी को पसंद करने लगते हैं तो वो चीज अपनी और इंसान अपने ही लगने लगते हैं.'
'हां ये बात तो है. जैसे शाहरुख खान मुझे अपना-सा लगता है. उनकी फिल्म हीट हो जाए तो अच्छा लगता है. बेशक वो फिल्म मैंने देखी हो या ना देखी हो.' फिर वो बीच-बीच में अपनी पसंद की किताबें दिखाती रही.
फिर एक जगह रुकी और बोली,' पापाजी ये देखो 'Rom-Com Books'.' 'Rom-Com Books' मतलब.' मैं बोला. ' सच आपको 'Rom-Com Books' का नहीं पता. 'Rom-Com Books' मतलब 'रोमांटिक कॉमेडी' वाली किताबें. 'वो बोली.
सच मुझे आज से पहले Rom-Com किताबों का नहीं पता था. और सच बताऊं तो मैंने आजतक विदेशी लेखकों की कम किताबें ही पढ़ी हैं. लेकिन हां हिंदी के लेखकों को तो खूब पढ़ा है. और उनका परिचय बेटी से भी कराया है. उनके किस्से बेटी को सुनाएं भी हैं. लेकिन तब जब उसे इतनी समझ नहीं थी, जितनी अब है. इसे यूं ही भी कह सकते हैं. मैंने पहले बेटी को हिंदी के लेखकों से मिलवाया था. और बेटी अब विदेशी लेखकों से परिचय करवा रही थी.
फिर बाद में हम दोनों पेट पूजा के लिए 'सरवाना भवन' की तरफ निकल गए.
~17.5.2025~
1.
पापा- कहां तक पहुंचे?
बेटी- कश्मीरी गेट.
पापा- अभी तक यहीं पहुंचे?
बेटी- वो मम्मी ने आइसक्रीम ले ली थी ना.
पापा- इतनी सर्दी में कौन आइसक्रीम खाता है!
बेटी- वो मम्मी ने ले ली थी ना. मुझे भी भूख लगी थी.
2.
सीपी में खादी भंडार से थापर की तरफ आते हुए एक छोटे से स्टाल पर खीरे, ककड़ी कटे हुए लगे थे. उन्हें देख बेटी बोलीं. 'पापाजी खीरे खा लो.'
मैं बोला,' अब तो जमाने हो गए ऐसे कटे खीरे, मूली खाए हुए. किसी जमाने में हम खूब खाते थे.' मतलब ये कि 2020 के पहले खूब खाते थे.
तपाक से बेटी बोलीं,' पापाजी, अब तो पुराने जमाने का फैशन भी लौटकर आ रहा है. आप भी पुराना ज़माना लौटा लाओ.'
~12.04.25~
पापा- अंकल जी के सवाल का जवाब देते वक्त आप आज थोड़ा घबरा गए थे बच्चू. वरना तो सही से बात कर लेते हो.
बेटी- पता है पापाजी. वो टीचर हों या फिर प्रोफेसर, उन्हें अपना स्माइली फेस रखना चाहिए. मैं उनके चेहरे को देख डर गया था. फिर मैं जवाब देते वक्त जो बात कहना चाह रहा था, वो नहीं कह पाया. प्रोफेसरों को इतनी सीरियस नहीं होना चाहिए. तब तो बिल्कुल नहीं, जब किसी से अकेले में बात कर रहो. ठीक है क्लास लेते वक्त सीरियस हो जाओ.
[ दिल्ली विश्वविधालय के एक प्रोफेसर से मुलाक़ात के बाद.]
पापा- कुछ लिखा है. सुनोगी.
बेटी- क्या लिखा है?
पापा- ख़त (एक तुकबंदी की थी बस.)
बेटी- किसको?
पापा- लड़की को!!
बेटी- जिस उम्र में लोग ये सब करने से मना करते हैं. आप उस उम्र में ये सब लिख रहे हो.
पापा- हा हा. अरे आप पूरी बात तो सुनो.
( वो पूरी बात सुने बिना चली गई.)
~07.07.25~